जयपुर में FMGE इंटर्न का धैर्य टूटा: ‘बराबर काम, बराबर वेतन’ की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे भावी डॉक्टर
द खबर टाइम्स। जयपुर: राजस्थान की गुलाबी सर्दी में इन दिनों एक अलग ही तपिश महसूस हो रही है। यह तपिश है जयपुर में चिकित्सा शिक्षा निदेशालय (DME) के बाहर चल रहे उस विरोध प्रदर्शन की, जिसमें Foreign Medical Graduates (FMG) या FMGE इंटर्न अपनी जायज मांगों को लेकर डटे हुए हैं। हाथ में बैनर और जुबां पर एक ही सवाल: “जब काम भारतीय मेडिकल कॉलेज के इंटर्न जैसा है, तो वेतन में भेदभाव क्यों?”

आस्था के बजाय आर्थिक मजबूरी
विदेशों, जैसे रूस, चीन, यूक्रेन या फिलीपींस से मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर भारत लौटे ये युवा अपनी दो साल की अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी कर रहे हैं। दिन-रात अस्पतालों में मरीजों की सेवा करते हैं, वार्डों के चक्कर लगाते हैं, और हर उस जिम्मेदारी को निभाते हैं जो एक MBBS डॉक्टर से अपेक्षित है।
लेकिन महीने के अंत में जब जेब खाली रहती है, तो उनकी आस्था और देशप्रेम पर एक गहरा सवालिया निशान लग जाता है।विरोध प्रदर्शन में शामिल एक इंटर्न, जो अपनी पहचान गुप्त रखना चाहती है, नम आंखों से बताती है, “हमने कई साल तक घर से दूर रहकर पढ़ाई की।
अब जब देश सेवा का मौका आया है, तो हमें आर्थिक रूप से तोड़ा जा रहा है। घर से पैसे मांगकर जयपुर जैसे शहर में रहना और इंटर्नशिप करना मुश्किल हो गया है। क्या हमारा श्रम भारतीय छात्रों के श्रम से कम है?”
सुप्रीम कोर्ट और NMC के आदेश का उल्लंघन
इस पूरे विवाद की जड़ में है इंटर्नशिप स्टाइपेंड (वेतन)। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दे रखा है कि सभी मेडिकल इंटर्न, चाहे वे भारत के ग्रेजुएट हों या विदेश के, उन्हें समान काम के लिए समान स्टाइपेंड मिलना चाहिए, जो कि वर्तमान में लगभग 21,700 रुपये प्रतिमाह है।
इसके अलावा, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की गाइडलाइन भी हर राज्य के मेडिकल कॉलेजों में इंटर्न को स्टाइपेंड देने को अनिवार्य बनाती है।
बावजूद इसके, राजस्थान के सरकारी मेडिकल कॉलेज इन आदेशों का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। इंटर्न को या तो स्टाइपेंड दिया ही नहीं जा रहा है, या फिर नाममात्र का दिया जा रहा है।
एक अन्य प्रदर्शनकारी डॉक्टर, डॉ. राजेश, कहते हैं, “हम राजस्थान सरकार और DME से कोई भीख नहीं मांग रहे हैं। हम अपना अधिकार मांग रहे हैं। जब सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है, तो फिर इसे लागू करने में देरी क्यों? क्या हम कानून से ऊपर हैं?”
हम फ्री लेबर नहीं हैं’
सोशल मीडिया पर भी यह गुस्सा फूट पड़ा है। #FMGEStipend, #FMGRajasthan, और #SameWorkSameStipend जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। एक ट्विटर यूजर ने लिखा है, “Day 3 of Protest. We are doctors, not free laborers. Give us our rights.” (प्रोटेस्ट का तीसरा दिन। हम डॉक्टर हैं, मुफ्त के मजदूर नहीं। हमें हमारे अधिकार दो।)
इंटर्न का कहना है कि वे तब तक नहीं हटेंगे जब तक कि उन्हें लिखित में आश्वासन नहीं मिल जाता कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार उन्हें पूरा स्टाइपेंड दिया जाएगा। यह सिर्फ पैसों की लड़ाई नहीं है, यह सम्मान और न्याय की लड़ाई है। अब देखना यह होगा कि राजस्थान सरकार कब इन भावी डॉक्टरों की आवाज सुनती है और कब इस प्रशासनिक उदासीनता को खत्म करती है।
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